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Khabar 360 India > Private: Blog > Uttarakhand > करोड़ों की लागत से बन रहे पुलों के निर्माण में देरी, BRIDCUL की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
Uttarakhand

करोड़ों की लागत से बन रहे पुलों के निर्माण में देरी, BRIDCUL की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल

Khabar 360 India Desk
Last updated: November 5, 2026 7:39 am
Khabar 360 India Desk Published November 5, 2026
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जखोल-लिवाड़ी पुल का ठेका समाप्त कर दोबारा निविदा की तैयारी, राणा-बनास-दुर्बिल पुल के डिजाइन में कई बार बदलाव; गंगाड गाड़ पुल की गुणवत्ता पर भी उठीं आपत्तियां

देहरादून। उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों में आवागमन को सुगम बनाने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की लागत से बनाए जा रहे पुलों की निर्माण प्रगति और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। BRIDCUL की विभिन्न परियोजनाओं में निर्माण में देरी, तकनीकी डिजाइन में बदलाव, ठेका समाप्त करने और गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के मामले सामने आए हैं। ऐसे में अब इन परियोजनाओं पर खर्च हुई वास्तविक धनराशि, भुगतान और शेष निर्माण कार्य की लागत का पूरा ब्योरा सामने आना जरूरी हो गया है।

जखोल-लिवाड़ी में 42 मीटर लंबे पुल के निर्माण के लिए करीब 2.54 करोड़ रुपये की निविदा जारी की गई थी। परियोजना रिकॉर्ड के अनुसार इसकी स्वीकृत लागत 256.66 लाख रुपये थी, जबकि अब तक 108.61 लाख रुपये का व्यय दर्ज किया गया है। दस्तावेजों में निर्माण की धीमी प्रगति को ठेका समाप्त करने का कारण बताया गया है। इसके बाद शेष कार्य पूरा कराने के लिए पुनर्निविदा की प्रक्रिया शुरू की गई। अब यह स्पष्ट होना बाकी है कि ठेका समाप्त होने तक संबंधित कार्यदायी संस्था को कितनी धनराशि का भुगतान किया गया और अधूरे काम को पूरा कराने के लिए नई निविदा में कितनी लागत तय की गई है।

राणा-बनास-दुर्बिल पुल के डिजाइन में बदलाव

राणा-बनास-दुर्बिल पुल परियोजना में तकनीकी बदलाव भी चर्चा का विषय हैं। मूल योजना में यहां 36 मीटर स्पान का पुल प्रस्तावित था। बाद के दस्तावेजों में इसे बढ़ाकर 42 मीटर करने और नई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद वर्ष 2024 में इसी स्थान पर 60 मीटर स्पान के पुल के डिजाइन और प्लानिंग के लिए कंसल्टेंसी आमंत्रित की गई।

निर्माण स्थल की परिस्थितियों और तकनीकी जरूरतों के आधार पर डिजाइन में बदलाव किया जा सकता है, लेकिन इस बदलाव के पीछे के तकनीकी कारण, संशोधित डीपीआर की स्वीकृति और अब तक हुए कार्य पर खर्च का विवरण सामने आना जरूरी है। इससे परियोजना की लागत और निर्माण प्रक्रिया में हुए बदलावों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

गंगाड गाड़ पुल की गुणवत्ता पर उठे थे सवाल

सौड़-ओसला मार्ग के किलोमीटर 16 में स्थित गंगाड गाड़ पुल के निर्माण में गुणवत्ता संबंधी शिकायतें सामने आई थीं। वर्ष 2026 में BRIDCUL ने इस मामले में परियोजना प्रबंधक के खिलाफ कार्रवाई की थी। प्राथमिक जांच में निर्माण सामग्री को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात सामने आई। हालांकि, बाद में हाईकोर्ट ने अधिकार-क्षेत्र के आधार पर निलंबन आदेश निरस्त कर दिया। इसके बाद मामले की विभागीय जांच लोक निर्माण विभाग (PWD) स्तर पर आगे बढ़ी।

ऐसे में जांच पूरी होने और अंतिम निष्कर्ष सामने आने से पहले किसी अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। विभागीय जांच के निष्कर्षों से ही गुणवत्ता संबंधी शिकायतों और जिम्मेदारी की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

थिरांग-सालंग पुल की देरी से सड़क निर्माण भी प्रभावित

थिरांग-सालंग में 90 मीटर लंबे पुल का निर्माण भी सड़क परियोजना की प्रगति को प्रभावित करता रहा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत स्वीकृति में इस पुल के लिए 9.30 करोड़ रुपये से अधिक की लागत निर्धारित की गई थी। वर्ष 2024 के प्रगति रिकॉर्ड में सड़क का अधिकांश निर्माण कार्य पूरा होने के बावजूद पुल का काम लंबित रहने के कारण निर्माण सामग्री और मशीनरी की आवाजाही प्रभावित होने का उल्लेख किया गया था। इससे स्पष्ट है कि पुल निर्माण में देरी का असर केवल संबंधित पुल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उससे जुड़ी सड़क परियोजना और स्थानीय आवागमन पर भी पड़ता है।

BRIDCUL के बड़कोट कार्यालय का CAG ने किया था ऑडिट

BRIDCUL के बड़कोट कार्यालय में 8 से 14 अक्टूबर 2024 तक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ओर से फील्ड ऑडिट किया गया था। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों से फिलहाल केवल ऑडिट प्रक्रिया की पुष्टि होती है। अंतिम ऑडिट रिपोर्ट और उसमें दर्ज आपत्तियां उपलब्ध हुए बिना किसी वित्तीय अनियमितता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

भुगतान और माप पुस्तिका से स्पष्ट होगी वास्तविक स्थिति

इन परियोजनाओं में स्वीकृत लागत, निविदा राशि, अनुबंध राशि और वास्तविक भुगतान के आंकड़े अलग-अलग हैं। ऐसे में निर्माण कार्यों की वास्तविक स्थिति और खर्च का आकलन करने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), अनुबंध पत्र, माप पुस्तिका (Measurement Book), भुगतान बिल, समयवृद्धि आदेश, ठेका समाप्ति आदेश, पुनर्निविदा और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र का मिलान जरूरी है।

फिलहाल उपलब्ध दस्तावेज सीधे तौर पर भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं देते, लेकिन निर्माण में देरी, तकनीकी बदलाव, ठेका समाप्ति और गुणवत्ता संबंधी शिकायतें विभागीय कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े करती हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की लागत से स्वीकृत इन पुलों का निर्माण तय समय पर क्यों पूरा नहीं हो पाया और देरी के लिए जिम्मेदारी किसकी है? इन परियोजनाओं में पारदर्शिता, समयबद्धता और प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने के लिए भुगतान से लेकर निर्माण की गुणवत्ता तक हर स्तर पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।

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TAGGED:Delays in the construction of bridges costing crores;questions raised regarding BRIDCUL’s functioning.
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